ये जिंदगी क्यों नाराज हो हम से

माँ मे दादी मे बाबा मे चाचा मे चाची मे सबमे तू दिखती थी, अनजान मासूम सी तू थी तब सब सच्चे थे अपने थे...शायद तब सबका प्यार सिर्फ प्यार दुलार ही दिखाई दिया

जनवरी 29, 2024 - 20:26
ये जिंदगी क्यों नाराज हो हम से

द स्वार्ड ऑफ इंडिया

जिंदगी कुछ कहना है तुमसे क्यों नाराज हो हमसे, कहाँ रहती है आजकल दिखाई नहीं देती, जबसे दुनिया मे आये माँ का आंचल ही लगा तुझसा, माँ मे दादी मे बाबा मे चाचा मे चाची मे सबमे तू दिखती थी, अनजान मासूम सी तू थी तब सब सच्चे थे अपने थे...

शायद तब सबका प्यार सिर्फ प्यार दुलार ही दिखाई दिया, हां तब चोट ज्यादा लगती थी पर दर्द कम होता था तब हसना खुश रहना बिन कारण आता था रोना... 

घर बदला रिश्ते बदले दिल से सोचना अच्छा लगता था मुझे, पर तूने सिखाया की दिमाग़ से सोचा जाता है अब चोट कम होती थी पर दर्द बहुत ज्यादा, एक हसीं पर दो आँखों को पानी भारी पड़ गया,

खुलकर हसना भूल गए पर मुस्कुराना सीख गए, खुलकर रोना भूल गए क्योंकि आँखे तब भीगी रहती थी, अब तो हर रिश्ता एक लेनदेन है हर शख्स व्यापारी लगता है, पर मुश्कुराना जरूरी है क्यों कि ये भी एक मजबूरी है ना मुस्कुराये तो सामने वाला दिमाग़ लगा लेगा तब किसी ने कान मे कहा ये दुनिया एक थिएटर है और हम सब किरदार निभा रहे है।

अनामिका द्विवेदी (अध्यापिका)

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